Anusanadhan: A Multidisciplinary International Journal (In Hindi)
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Anusandhan: A Multidisciplinary International Journal (Hindi)Advanced Research Publicationsen-USAnusanadhan: A Multidisciplinary International Journal (In Hindi)2456-0510छात्रों के शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के प्रशिक्षार्थियों की तार्किक एवं समस्या समाधान योग्यता का अध्ययन
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<p data-start="114" data-end="479">“इस शोध पत्र में बीकानेर संभाग के शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के प्रशिक्षार्थियों की तार्किक एवं समस्या समाधान योग्यता का अध्ययन किया गया है। इसमें अध्ययन के उद्देश्य प्रशिक्षार्थियों की तार्किक एवं समस्या समाधान योग्यता का अध्ययन सुनिश्चित किए गए हैं। इसमें 6 शोध परिकल्पनाओं का निर्माण किया गया है। प्रस्तुत अध्ययन में सर्वेक्षण विधि का उपयोग किया गया है।</p> <p data-start="481" data-end="936">इसमें बीकानेर संभाग के शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय एवं शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय के 144 बी.एड. प्रशिक्षार्थियों, जिसमें शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय के 72 प्रशिक्षार्थी तथा शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के 72 प्रशिक्षार्थियों पर अपना अध्ययन कार्य संपन्न किया गया है। इनके अंतर्गत भी इन्हें दोनों महाविद्यालयों में 72 पुरुष एवं 72 महिला प्रशिक्षार्थियों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस पूरे नमूने का चयन राजस्थान राज्य के बीकानेर संभाग से किया गया है।</p> <p data-start="938" data-end="1502">शोध में तार्किक योग्यता एवं समस्या समाधान स्वनिर्मित योग्यता मापनी का प्रयोग किया गया है। अध्ययन की प्रकृति एवं उद्देश्यों के आधार पर प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण हेतु मध्यमान, प्रमाप विचलन एवं क्रांतिक अनुपात का प्रयोग किया गया है। निष्कर्ष रूप में बीकानेर संभाग के शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय एवं शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय के प्रशिक्षार्थियों की तार्किक एवं समस्या समाधान योग्यता के अध्ययन के आधार पर यह पाया गया कि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय की तुलना में शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय के प्रशिक्षार्थियों की तार्किक एवं समस्या समाधान योग्यता उच्च स्तर की है।”</p> <p><strong>How to cite this article:</strong></p> <p>सुरेश शर्मा, बीकानेर संभाग के शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के प्रशिक्षार्थियों की तार्किक एवं समस्या समाधान योग्यता का अध्ययन Anu: a, Mul, Int, Jour, <em>2026</em>; 11(3&4): 1-8.</p> <p><strong>DOI:</strong> https://doi.org/10.24321/2456.0510.202615</p> <p><strong> </strong></p>Suresh Sharma
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2026-06-052026-06-05113&418अध्ययन एक तुलनात्मक अध्ययन: राजकीय माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों में मूल्यों का तुलनात्मक अध्ययन
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<p data-start="182" data-end="646">मूल्य हमारी स्वयं की अभिवृत्ति का वह कार्य है जिसकी उपयोगिता एक व्यक्ति, समाज, राष्ट्र अथवा सम्पूर्ण विश्व के लिए उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है। साथ ही यह आस्तिकतामय तथा निर्धारित प्रवृत्तियाँ भी हैं। मूल्य संबंधों को संतुलित करके व्यवहार में एकरूपता एवं आत्मीयता स्थापित करते हैं। मूल्य की कल्पना मानव अस्तित्व को पूर्ण रूप से स्वीकार किए बिना संभव नहीं है। मूल्य की अपनी एक प्राकृतिक व्यवस्था होती है। मूल्य स्वयं एक व्यवस्था है जो मानव जीवन को संस्कारित करती है।</p> <p data-start="648" data-end="1384">मूल्य विकास के क्रम में मानव सबसे पहले इन्द्रिय विषय बोध अर्थात् सुख एवं आनंद को मूल्यांकन का आधार बनाता है। तत्पश्चात सुख के साथ ही मूल्यांकन में सुरक्षा का भाव भी समाहित हो जाता है और अंत में अपने सुख, सुरक्षा एवं हित के साथ-साथ समाज के हित एवं सुरक्षा का भाव भी मानव में उत्पन्न होता है तथा इसी दृष्टिकोण से वह मूल्यों का निर्धारण करता है। मानव में समष्टि हित का यही भाव उसमें निहित उच्चतम मूल्यों का द्योतक है। उच्चतम मूल्यों से युक्त होने पर व्यक्ति अपने जीवन का लक्ष्य मात्र अपने सुख एवं समृद्धि तक सीमित न रखकर समाज के सुख, समृद्धि एवं सुरक्षा तक विस्तृत कर देता है। अतः किसी भी व्यक्ति के जीवन में संतुष्टि के लिए सुख, समृद्धि एवं सुरक्षा महत्वपूर्ण कारक होते हैं, जिन्हें मूल्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।</p> <p><strong>How to cite this article:</strong></p> <p>उषा शर्मा, केंद्रीय माध्यमिक विद्यालय तथा राजकीय माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों में मूल्यों का तुलनात्मक अध्ययन Anu: a, Mul, Int, Jour, <em>2026</em>; 11(3&4): 9-14.</p> <p><strong>DOI:</strong> https://doi.org/10.24321/2456.0510.202616</p>Usha Sharma
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2026-06-052026-06-05113&4914नालंदा की नई शक्ति: शिक्षित महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता और कुपोषण नियंत्रण में उनकी भूमिका
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<p>यह लेख बिहार के नालंदा जिले के विशेष संदर्भ में शिक्षित महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता और बाल कुपोषण के बीच के गहन अंतर्संबंधों का विस्तृत विश्लेषण करता है। अध्ययन का मुख्य तर्क यह है कि लेखिका शिक्षा केवल साक्षरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन्हें आर्थिक निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति प्रदान करती है, जो सीधे तौर पर परिवार के पोषण स्तर को प्रभावित करती है। जब महिलाएँ शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती हैं, तो वे घरेलू आय का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्यप्रद भोजन और चिकित्सा देखभाल पर खर्च करती हैं। नालंदा जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में, जहाँ कुपोषण एक गंभीर चुनौती है, शिक्षित महिलाओं की वित्तीय स्वायत्तता पोषण संबंधी असुरक्षा को कम करने में एक 'गेम-चेंजर' साबित हो रही है। यह लेख विभिन्न सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के माध्यम से यह दर्शाता है कि कैसे महिलाओं के पास धन का नियंत्रण होने से बच्चों के आहार में विविधता और गुणवत्ता सुनिश्चित होती है। लेख यह भी रेखांकित करता है कि आर्थिक रूप से सुदृढ़ माताएँ स्वास्थ्य और स्वच्छता (WASH) संकेतकों पर बेहतर निवेश करती हैं, जो बच्चों को संक्रमण चक्र से बचाता है। निष्कर्षतः, लेख यह प्रस्तावित करता है कि कुपोषण उन्मूलन के लिए महिलाओं का शैक्षणिक और आर्थिक सशक्तिकरण एक अनिवार्य पूर्व शर्त है। सरकारी नीतियों को केवल खाद्यान्न वितरण तक सीमित न रहकर महिलाओं के व्यावसायिक प्रशिक्षण और वित्तीय समावेशन पर केंद्रित होना चाहिए ताकि कुपोषण के चक्र को जड़ से समाप्त किया जा सके। यह लेख नालंदा के जमीनी अनुभवों के आधार पर महिला एजेंसी और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच एक नया विमर्श प्रस्तुत करता है। भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के 'क्षमता दृष्टिकोण' (Capability Approach) के अनुरूप, यह लेख स्पष्ट करता है कि महिलाओं की 'एजेंसी' ही बाल कुपोषण के विरुद्ध सबसे प्रभावी ढाल है। अंततः, महिला की आर्थिक स्वतंत्रता ही वह प्राथमिक माध्यम है जो बाल विकास और समाज के समग्र पोषण मानकों को उन्नत करती है।</p> <p><strong>How to cite this article:</strong></p> <p>नालंदा की नई शक्ति: शिक्षित महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता और कुपोषण नियंत्रण में उनकी भूमिका, Anu: a, Mul, Int, Jour, <em>2026</em>; 11(3&4): 15-25.</p> <p><strong>DOI: </strong>https://doi.org/10.24321/2456.0510.202618</p>मनोज कुमार
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2026-06-052026-06-05113&41525