गीता मनोविजà¥à¤žà¤¾à¤¨ à¤à¤• समालोचनातà¥à¤®à¤• दृषà¥à¤Ÿà¤¿
Keywords:
गीता, मनोविजà¥à¤žà¤¾à¤¨, पà¥à¤°à¤¾à¤£ की ऊरà¥à¤œà¤¾, मन का नियनà¥à¤¤à¥à¤°à¤£Abstract
मनीषियों, दारà¥à¤·à¤¨à¤¿à¤•ो, सनà¥à¤¤à¥‹à¤‚ और गà¥à¤°à¥à¤“ं ने इस संसार को दà¥à¤ƒà¤– रूप माना है। सामानà¥à¤¯ दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से देखने पर à¤à¤¸à¤¾ पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤¤ नहीं होता किनà¥à¤¤à¥ महरà¥à¤·à¤¿ पतंजलि ने इसका समाधान करते हà¥à¤ अपने गà¥à¤°à¤¨à¥à¤¥ योगसू़तà¥à¤° में “दà¥à¤ƒà¤– मेव सरà¥à¤µà¤‚ विवेकिनः†कहकर बताया है कि- संसार में विवेकी मनà¥à¤·à¥à¤¯ को ही दà¥à¤ƒà¤– दिखाई देता है। सांसारिक मनà¥à¤·à¥à¤¯ इस संसार में संघरà¥à¤· करता हà¥à¤† सà¥à¤– पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करता रहता है। इसका कारण उसका संषयातà¥à¤®à¤• मन है। गीता मन की संषयातà¥à¤®à¤• सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ का निवारण आसानी से कर देती है। गीता में मन के विजà¥à¤žà¤¾à¤¨ को वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤°à¤¿à¤• मनोविजà¥à¤žà¤¾à¤¨ के रूप में वरà¥à¤£à¤¿à¤¤ किया है। गीता में मन के विषय में गवेषणातà¥à¤®à¤• तथà¥à¤¯à¥‹à¤‚ को देखकर सिदà¥à¤§ होता है कि- गीता à¤à¤• मनोवैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• शासà¥à¤¤à¥à¤° है। गीता में जिन तथà¥à¤¯à¥‹à¤‚ की आधà¥à¤¨à¤¿à¤• विवेचना की गई है वे आधà¥à¤¨à¤¿à¤• मनोविजà¥à¤žà¤¾à¤¨ में पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ नही होते हैं। गीता मनोविजà¥à¤žà¤¾à¤¨ में अà¤à¤¿à¤•à¥à¤°à¤® की अनषà¥à¤µà¤°à¤¤à¤¾ को माना गया है। अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤ करà¥à¤® का संसà¥à¤•ार आगे के जनà¥à¤®à¥‹à¤‚ मे à¤à¥€ बना रहता है गीता का मानना है कि- यदि संसार से या दà¥à¤ƒà¤–ों से दूर होना है तो मन को निसà¥à¤¤à¥à¤°à¥ˆà¤—à¥à¤£à¥à¤¯ करना पड़ेगा गीता करà¥à¤® से बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ की शà¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ ता को सà¥à¤µà¥€à¤•ार करती है। साथ ही केवल शासà¥à¤¤à¥à¤°à¤¾à¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ करना निररà¥à¤¥à¤• मानती है। गीता में साधना पकà¥à¤· के ऊपर बल दिया गया है। किनà¥à¤¤à¥ वहाठà¤à¥€ वह संसार का तà¥à¤¯à¤¾à¤— करना सà¥à¤µà¥€à¤•ार नहीं करती बलà¥à¤•ि “यà¥à¤•à¥à¤¤ आहार विहार†का पालन करते हà¥à¤ करà¥à¤® करते हà¥à¤ मन से ऊपर उठने की बात कहती है।
DOI: https://doi.org/10.24321/2456.0510.202101
References
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