श्रीरामचरितमानस में व्याप्त लोकमंगल की भावना
Abstract
राम चरित मानस तुलसी साहित्य का महाकाव्य है। इसे कलियुगीन सामवेद भी कहा जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में लोकमंगल की कामना को सर्वोपरि रखा। लोकमंगल अर्थात जन सामान्य से जन विशेष तक। मंगल का अभिप्राय है शुभ हित चिंतन। तुलसीदास जी कहते हैं कि इस प्रकृति की संरचना में जड़-चेतन, स्थावर-जंगम सभी का कल्याण हो क्योंकि सभी में परमात्मा का अंश है। इसीलिए तुलसीदास जी चेतन की सभी योनियों, देव, दानव, मनुष्य, सर्प, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, किन्नर एवं राक्षस सभी से प्रार्थना करते हैं कि उनकी इस मंगल-कामना में सभी उनकी सहायता करें। वे इस सृष्टि के जल-थल एवं गगनचारी चार लाख चैरासी योनियों में समाहित प्राणियों का कल्याण चाहते हैं। गोस्वामी जी की समत्व दृष्टि में सभी उनके ईष्ट के प्यारे हैं उन सभी की वे वन्दना करते हैं।
References
तुलसीदास श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 07(ग) 07(घ), पृ. 39
तुलसीदास श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 07(घ), पृ. 39
तुलसीदास श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 08, चैपाई 1,2 पृ. 39
तुलसीदास रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 254, चैपाई 3, पृ. 364
दीपाली आस्था, 2021, काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था के आधार पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि
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तुलसीदास रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 21, चैपाई 4, पृ. 600
तुलसीदास रामचरितमानस, बालकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 209, चैपाई 7,8, पृ. 151
तुलसीदास रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 53, चैपाई 6, पृ. 262
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तुलसीदास रामचरितमानस, लंकाकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 125, चैपाई 3 पृ. 567
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तुलसीदास रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 20, चैपाई 7, पृ. 599
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