श्रीरामचरितमानस में व्याप्त लोकमंगल की भावना

Authors

  • Uma Shrivas Student, Department of Hindi, Dr C V Raman University Kota Bilaspur, Chhattisgarh, India.
  • Sahid Hussain Assistant Professor, Department of Hindi , Dr CV Raman University Kota Bilaspur, Chhattisgarh, India.

Abstract

राम चरित मानस तुलसी साहित्य का महाकाव्य है। इसे कलियुगीन सामवेद भी कहा जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में लोकमंगल की कामना को सर्वोपरि रखा। लोकमंगल अर्थात जन सामान्य से जन विशेष तक। मंगल का अभिप्राय है शुभ हित चिंतन। तुलसीदास जी कहते हैं कि इस प्रकृति की संरचना में जड़-चेतन, स्थावर-जंगम सभी का कल्याण हो क्योंकि सभी में परमात्मा का अंश है। इसीलिए तुलसीदास जी चेतन की सभी योनियों, देव, दानव, मनुष्य, सर्प, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, किन्नर एवं राक्षस सभी से प्रार्थना करते हैं कि उनकी इस मंगल-कामना में सभी उनकी सहायता करें। वे इस सृष्टि के जल-थल एवं गगनचारी चार लाख चैरासी योनियों में समाहित प्राणियों का कल्याण चाहते हैं। गोस्वामी जी की समत्व दृष्टि में सभी उनके ईष्ट के प्यारे हैं उन सभी की वे वन्दना करते हैं।

References

तुलसीदास श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 07(ग) 07(घ), पृ. 39

तुलसीदास श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 07(घ), पृ. 39

तुलसीदास श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 08, चैपाई 1,2 पृ. 39

तुलसीदास रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 254, चैपाई 3, पृ. 364

दीपाली आस्था, 2021, काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था के आधार पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि

तुलसीदास रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 20, चैपाई 8, पृ. 599

तुलसीदास रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 21, चैपाई 4, पृ. 600

तुलसीदास रामचरितमानस, बालकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 209, चैपाई 7,8, पृ. 151

तुलसीदास रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 53, चैपाई 6, पृ. 262

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तुलसीदास रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 09, पृ. 410

तुलसीदास रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 154 चैपाई 3, पृ. 334

तुलसीदास रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 136, पृ. 305

तुलसीदास रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 35, चैपाई 04 पृ. 432

तुलसीदास रामचरितमानस, किष्किंधाकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 11, चैपाई 3 पृ. 448

तुलसीदास रामचरितमानस, लंकाकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 125, चैपाई 3 पृ. 567

तुलसीदास रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 10, चैपाई 1, पृ. 591

तुलसीदास रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 30, चैपाई 9,10 पृ. 428

तुलसीदास रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 200, चैपाई पृ. 337

तुलसीदास रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 32, चैपाई 8 पृ. 252

तुलसीदास रामचरितमानस, लंकाकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 17, चैपाई 6,7,8 पृ. 508

तुलसीदास रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 20, चैपाई 7, पृ. 599

तुलसीदास रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, मूलगुटका, गीताप्रेस, गोरखपुर, दोहा क्रमांक 21, चैपाई 5,6,7, पृ. 600

Published

2024-08-20

How to Cite

Shrivas, U., & Hussain, S. (2024). श्रीरामचरितमानस में व्याप्त लोकमंगल की भावना. Anusanadhan: A Multidisciplinary International Journal (In Hindi), 9(3&4), 7-10. Retrieved from https://thejournalshouse.com/index.php/Anusandhan-Hindi-IntlJournal/article/view/1520