मनोरोग के निवारण में क्रियायोग की भूमिका
Keywords:
मनोरोग, क्रियायोग, द्वन्द्व, शरीर शुद्धि, इन्दिय शुद्धि, निराहार ओ३म्, स्वाध्याय, उपांशुAbstract
योग विद्या सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव कल्याण हेतु उपयोगी होती रही है। योग के द्वारा हमारे ऋषि मुनियों ने अध्यात्म जगत में उन्नति के शिखर को छुआ है और मानव के बहुत से अनसुलझे रहस्यों को उजागर किया है। आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ योग विद्या का मनुष्य के शरीर और मन के विकारों के निवारण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आधुनिक युग में भी योग के अभ्यास से मनुष्य जीवन के सभी द्वन्द्वों से छुटकारा पा सकता है। महर्षि पतंजलि आदि ऋषियों ने मनुष्य को जीवन की समस्याओं से विचलित न होते हुए, किस तरह से उनका समाधान किया जाये इसका ज्ञान सहज ही उपलब्ध करा दिया है। महर्षि पतंजलि द्वारा रचित योग विद्या के अद्वितीय ग्रन्थ पतंजलि योग सूत्र में मानव जाति के कल्याणार्थ जो ज्ञान दिया है उसको उन्होंने सूत्रों की एक माला में मोतियों की तरह गूँथा है। प्रत्येक सूत्र अपने आप में सम्पूर्ण योग विद्या को समाये हुए है। इन्हीं मोतियों में से एक मोती "तपः स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधान" को महर्षि पतंजलि ने क्रियायोग के नाम से उल्लिखित किया है। इस सूत्र को जीवन में धारण करने से मनुष्य अपने सांसारिक जीवन के सम्पूर्ण द्वन्द्वों से लड़ते हुए भी जीवन आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग के ऊपर तीव्रता से गमन कर सकता है। और सम्पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक विकारों से मुक्त हो सकता है।