मुन्शी प्रेमचंद की कहानियों में नारी विषयक अवधारणा का विश्लेषण
Keywords:
दीप्ति खण्डेलवाल, नारी स्वर, स्त्री विमर्श , आत्मचेतना, सामाजिक शोषण , विद्रोह, अस्मिता , समकालीन हिंदी कहानी , स्त्री अनुभव , स्वतंत्रताAbstract
मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के युगप्रवर्तक कथाकार हैं, जिनकी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ का गहन चित्रण मिलता है। उनकी कहानियों में नारी विषयक दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रेमचंद ने नारी को केवल दया की पात्र न मानकर, उसे एक संघर्षशील, आत्मनिर्भर और आत्मसम्मान से युक्त मानव रूप में चित्रित किया है। उन्होंने समाज में स्त्रियों की स्थिति, उनके अधिकारों, उनकी भावनाओं और उनके शोषण को बहुत ही संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है। उनकी कहानियों की स्त्रियाँ कभी त्याग और बलिदान की मूर्ति हैं तो कभी विद्रोह और आत्मसम्मान की प्रतीक। "सेवासदन", "प्रेमाश्रम", "निर्मला", और "कफन" जैसी रचनाओं में नारी पात्रों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, पितृसत्तात्मक व्यवस्था और स्त्री-शोषण पर करारा प्रहार किया है। यह शोधपत्र प्रेमचंद की कहानियों में चित्रित नारी विषयक अवधारणा का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है और यह दर्शाता है कि वे अपने समय में स्त्री विमर्श के एक सशक्त प्रवक्ता थे।
References
खण्डेलवाल, दीप्ति। जो शेष है। राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
खण्डेलवाल, दीप्ति। उसने कहा था (कहानी संग्रह)। हिन्द युग्म प्रकाशन, 2021।
श्रीवास्तव, डॉ. सुधा। समकालीन हिंदी कहानी और स्त्री विमर्श। वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
त्रिपाठी, डॉ. शशि। नारी चेतना और हिंदी कथा साहित्य। साहित्य भवन, इलाहाबाद।
यादव, डॉ. सीमा। स्त्री विमर्श: संदर्भ और परिप्रेक्ष्य। प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली।
मिश्र, डॉ. कविता। हिंदी की समकालीन महिला कथाकारें। मीना बुक्स, लखनऊ।
अग्रवाल, डॉ. रेखा। नारी विमर्श की नई दिशाएँ। भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।
गुप्ता, डॉ. नीलिमा। हिंदी कहानी में स्त्री का बदलता स्वरूप। बुक्स इंडिया, भोपाल।
नारीवादी आलोचना विशेषांक। हंस पत्रिका, विभिन्न अंक।