भारतीय ज्ञान परंपरा एवं सतत विकास: एक समग्र विश्लेषण
Keywords:
भारतीय ज्ञान परंपरा, सतत विकास, पर्यावरणीय संतुलन, संयम व अपरिग्रह एवं सामुदायिक विकासAbstract
इस शोध पत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा तथा सतत विकास के मध्य घनिष्ठ एवं गहरा अंतर्संबंध बताया गया है। भारतीय चिंतन के अंतर्गत प्रकृति के साथ सामंजस्य, समन्वित, संसाधनों के संतुलित व किफायती उपयोग, नैतिक जीवनशैली तथा सामाजिक समरसता जैसे तत्वों पर गहनता के साथ विशेष बल दिया गया है जो व्यापक संदर्भ में समकालीन सतत विकास की अवधारणा के अनुरूप ही हैं। प्राचीन ग्रंथों, पारंपरिक जीवन तौर-तरीकों और व्यावहारिक अनुभवों में उदाहरणस्वरूप ऐसे अनेक सिद्धांत एवं विचार मिलते हैं जो मानव और पर्यावरण के बीच घनिष्ठता एवं संतुलन स्थापित करनेपर बल देते हैं। अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि निस्संदेह भारतीय ज्ञान परंपरा केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं है बल्कि यह व्यावहारिक दृष्टि से भी मानव जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी है। विशेषकर जल संरक्षण, जैविक कृषि, प्राकृतिक चिकित्सा और सामुदायिक जीवन जैसी व्यवस्थाएँ सतत विकास के लिए प्रभावी आधार प्रदान करती हैं। यद्यपि पारंपरिक ज्ञान का क्षरण, वैज्ञानिक प्रमाणिकता का अभाव तथा नीतिगत स्तर पर सीमित समावेशन जैसी चुनौतियाँ इसके व्यापक उपयोग में बाधा का कार्य करती हैं। अतः आवश्यक है कि इस ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा, नीतियों और तकनीकी नवाचारों के साथ समन्वित किया जाए और व्यवहार में इस पर अमल किया जाए ताकि एक संतुलित, समावेशी और दीर्घकालिक विकास मॉडल स्थापित किया जा सके।
How to cite this article:
शैवेन्द्र कुमार व्यास, भारतीय ज्ञान परंपरा एवं सतत विकास: एक समग्र विश्लेषण, Anu: a, Mul, Int, Jour, Vol 11, 2026 (Special Issue): Pg. No. 44-52
DOI: https://doi.org/ 10.24321/2456.0510.202614