भारतीय संस्कृति के बहुआयामी विकास में बौद्ध दर्शन की भूमिका: एक अंतर्संबंधात्मक विमर्श
Abstract
प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय संस्कृति के विविध आयामों—सामाजिक, दार्शनिक, साहित्यिक, कलात्मक एवं वैश्विक—के क्रमिक विकास में बौद्ध जीवन-दर्शन की अंतर्निहित भूमिका का एक आलोचनात्मक एवं अंतर्संबंधात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में गंगा घाटी में उत्पन्न हुए बौद्ध आंदोलन ने तत्कालीन रूढ़िवादी सामाजिक संरचना, पुरोहितीय वर्चस्व और जटिल कर्मकांडों को तार्किक चुनौती दी। बौद्ध दर्शन ने केवल एक आध्यात्मिक विकल्प ही प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि भारतीय मानस को “मध्यम मार्ग”, “अहिंसा” और “करुणा” जैसे व्यावहारिक सिद्धांतों से सिंचित कर एक नए युग का सूत्रपात किया। यह शोध इस तथ्य को रेखांकित करता है कि यद्यपि कालक्रम में भारत भूमि पर संगठित बौद्ध धर्म का संकुचन हुआ, तथापि इसके दार्शनिक और सांस्कृतिक मूल्य भारतीय अस्मिता के मूल आधारों में अपनी गहन पैठ बनाए रहे। इस शोध पत्र के परिणाम यह प्रतिपादित करते है कि आधुनिक भारतीय संस्कृति का बहुआयामी ढांचा बौद्ध दर्शन के ऐतिहासिक अवदानों के साथ अटूट रूप से अंतर्संबंधित है।
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उमेश चन्द्र, रामेश्वर पाण्डेय, भारतीय संस्कृति के बहुआयामी विकास में बौद्ध दर्शन की भूमिका: एक अंतर्संबंधात्मक विमर्श, Anu: a, Mul, Int, Jour, 2025; 10(3&4): 37-40.
DOI: https://doi.org/10.24321/2456.0510.202512