कुमाऊँ गढ़वाल में ब्रिटिश प्रशासन (1815.1857 ई0)
Abstract
दार्जलिंग से शिमला तक पहाड़ और कुछ भाग तराई का, नेपाल राज्य में था। उधर दक्षिण से बढ़ते बढ़ते अंग्रेज भी हिमालय की जड़ में पहुँच गये थे। हिमालय के ठण्डे स्थान जो इंग्लैण्ड की जलवायु सदृश थे तथा बहुमूल्य खनिज सम्पदा से भरपूर थे अंग्रेजों के लोभ को और बड़ा रहे थे। अतः ऐसी स्थिति में अंग्रेजों को बहाना मात्र चाहिए था वे नेपाल से हिमांलय तक अधिक से अधिक भाग को छीन लेना चाहते थे। इस पर गर्वनर जनरल लार्ड हेस्टिंग्स ने अप्रैल 1814 ई. में विवादास्पद भूभाग पर अधिकार करने का हुक्म दिया और वह काम निर्विरोध पूरा हो गया।’’ 1814 में गोरखों ने शिवराज पर अधिकार कर लिया तथा तीन थानों को जला दिया। अतः 1814 ई0 में गर्वनर जनरल लार्ड हैस्टिंग्स ने गोरखों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। चार अंग्रेजी सेनाऐं चार भागों से नेपाल और कुमाऊँ पर अधिकार करने के लिए भेजी गयी। जनरल आक्टरलोनी की सेना के अतिरिक्त सभी अंग्रेज सेनापतियों को गोरखों की सेना से पराजित होना पड़ा। आक्टरलोनी ने गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा को पराजित कर दिया। अन्त में एक सेना कर्नल गार्डनर के नेतृत्व में रुद्रपुर भमौरी होते हुए भीमताल की ओर से बाराखेड़ी के किले पर अधिकार के लिए भेजी गयी। गार्डनर की सेना बिना किसी विरोध के 12 फरवरी को कन्यासी, 13 को चिलकिया और 14 को मसौत पहुँच गयी। गोरखा सेना को कमपुर (रानीखेत) से हटाने के लिए गार्डनर 26 फरवरी से 22 मार्च तक टक्कर मारता रहा, चूंकि अब रुहेले भी अंग्रेजों की सहायता कर रहे थे। अल्मोड़ा और कमपुर (रानीखेत) के बीच स्याहीदेवी एक बड़े ही महत्व का स्थान था, किन्तु उसकी रक्षा का गोरखों ने कोई प्रबन्ध नहीं किया था। अंग्रेजों ने उसे 23 मार्च को ले लिया। गोरखा सेना अब अल्मोड़ा तक मुकाबला नहीं कर सकती थी। अल्मोड़ा से सात मील पर स्थित अपने सूर्य मन्दिर के लिए प्रसिद्ध, कटारमल में लड़ना व्यर्थ समझकर गोरखा टुकड़ी हट गयी। और अल्मोड़ा से दो मील नीचे सितोली पहाड़ी पर खड़ी हुई। एटकिन्सन ने लिखा है ‘‘यह स्वीकार करना पड़ेगा कि अंग्रेजों की सफलता का कारण उनका अपना कौशल और साहस नहीं था, जितनी कि शत्रु की कमजोरी’’। अल्मोड़ा के पास तक गोरखों के इस तरह बिना लड़े पीछे हटने से कुमाऊँनियों पर बुरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने गोरखों का साथ देना छोड़ दिया। उधर हर्षदेव का प्रभाव भी अंग्रेजों की ओर ही काम कर रहा था। लेकिन 31 मार्च को चम्पावत से पांच मील उत्तरपूर्व की ओर खिलपाती के पास अंग्रेजी एवं गोरखा सेना के बीच जो युद्ध हुआ उसमें अंग्रेजों को हार का मुहं देखना पड़ा। कप्तान हियरसी बन्दी बना लिया गया लेकिन गोरखों ने इस बड़ी विजय का जितना फायदा उठाना चाहिए था, नहीं उठाया। 8 अप्रैल (1815) को कर्नल निकल्सन नयी सेना लेकर कटारमल पहुंचा, और उसने सारी सेना का संचालन अपने हाथों में ले लिया। उधर हस्तिदल भी अल्मोड़ा पहुंच गया। 23 अप्रैल को गणानाथ के मन्दिर के पास दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ, जिसमें वीर हस्तिदल मारा गया। फ्रेजर के अनुसार ‘‘हस्तिदल की मृत्यु से शत्रु ने एक अत्यन्त महत्वाशाली, कर्मठ और साहसी अफसर को खो दिया। वह नेपाल के राजा का चाचा या मामा था, उसकी प्रतिभा तथा सद्गुण अपने उच्चकुल के अनुकूल थे। 26 अप्रैल 1815 ई0 को अंग्रेजी सेना ने अल्मोड़ा पर अधिकार कर लिया तथा अल्मोड़ा में गोरखों के लाल मंडी किले का नाम तत्कालीन गर्वनर जनरल मोयरा के नाम से ‘‘फोर्ट मोयरा’’ रखा गया। 1815 ई0 में ‘‘सुगौली सन्धि’’ के अनुसार गढ़वाल पर भी अधिकार हो गया। प्रस्तुत शोध पत्र में कुमाऊँ-गढ़वाल में 1815 से कम्पनी शासन को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।